शनिवार, 1 जून 2013

लीची वाली अम्मा !!


अब फिर गर्मियों का मौसम आ गया है, पेड़ों पर फिर से लीचियां आ गयीं है, फिर वही बड़े-बड़े गुच्छे लटकने लगे हैं ! बस, उनको देखते ही मुँह से पानी टपकने लगता है, हाथ मचल उठते हैं उन्हें तोड़ने को ! लेकिन… फिर से काले बड़े गेट पर आ खड़ी होगी अम्मा- यही देखने को की कहीं
कोई बाग़ से लीची न तोड़ ले जाए ! हर वक़्त अम्मा की नज़र मोहल्ले के लडको पर लगी रहती थी, की कहीं कोई लड़का दीवार फांद कर लीचियों का गुच्छा न ले जाए ! हर वक़्त बस यही चिंता, यही फ़िक्र सताती थी अम्मा जी को, और हो भी क्यूँ न? बड़ी मेहनत से अम्मा के मियां जी ने लगाये थे लीची के पेड़ !!

ऐसा सुना था हमने, की अम्मा जी जब ब्याह के आई थी मियां जी के घर, तब सारा आँगन खाली था - बस कुछ झाड़ियाँ थी और इधर उधर छोटे छोटे ठुट से पेड़ थे ! सारा दिन आँगन में बस धुल उड़ा करती थी ...तीसरे ही दिन अम्मा जी ने पूरा आँगन साफ़ करके सारी झाडी और पेड़ कटवा दिए और मियां जी से लीची के पेड़ लगाने की जिरह कर दी ! अब मियां जी आखिर अपनी नयी बेगम का कहा थोड़ी न टालते - बस अगले ही दिन लीची के गुच्छे ले आये बाज़ार से और शाम को ही बीज बो डाले आँगन में ! बस फिर क्या था, अम्मा जी लग गयी लीची के पेड़ों को बड़ा करने में ! दिन में चार बार पानी देती और वक़्त वक़्त पे खाद डालती !

अब तो हर वक़्त अम्मा जी लीचियों की देखभाल में लगी रहती, कभी कभी तो मियां जी को खाना देना भी भूल जाती थी ! पूरे दस पेड़ लगाए थे मियां जी ने, तो कैसे न देखभाल करती उनका ? ठीक वैसे ही जैसे माँ अपने बच्चों का ख्याल करती है, सुबह से दोपहर तक, दोपहर से शाम तक और शाम से रात तक ! मोहल्ले वाले तो यह कहते थे- यह पेड़ नहीं अम्मा के बेटे हैं ! कभी कभी मजाक में तो यह भी कहते - कुंती के पांच पांडव और अम्मा के दस ! ये सुनकर तो अम्मा बस खुशी से फूले न समाती !

अब तो अम्मा जी के पेड़ बढने लगे थे, पेड़ों पर बड़ी बड़ी लीचियां लगने लगी थी ! मोहल्ले के लड़के चुपके से दीवार कूद कर लीचियां तोड़ लिया करते थे ! जैसे ही खटका होता, अम्मजी जी तुरंत हाथ में डंडा लिए दीवार की ओर दौड़ पड़ती लडको को मारने के लिए - लेकिन लड़के भी कहाँ अम्मा के हाथ आने वाले थे - बस झट से लीची तोड़ते और सरपट भाग लेते ! लेकिन अम्मा तो आखिर अम्मा ठहरी - पूरी दौड़ लगाती थी गली के नुक्कड़ तक - की शायद कोई हाथ आ जाये, लेकिन हर वक़्त मायूसी ही हाथ आती और फिर बड्डबड्डाती वापिस चारपाई बिछा कर बैठ जाती - इसी उम्मीद में की अब की बार कोई लड़का हाथ आये तो जम कर पिटाई करूँ !

बस यही दिनचर्या थी अम्मा जी की - सुबह मियां जी को नाश्ता करवा के, दिन का खाना डब्बे में रख देती थी ! आखिर मियां जी भी सरकारी क्लर्क थे रेलवे में ! रोज़ सुबह नियम से नौ बजे जाना और शाम को साढ़े छ बजे लौटना ! मियां जी के जाते ही लग जाती थी अम्मा जी अपने लीची के पेड़ों की सेवा में - खाद डालना, पानी देना, एक एक पत्ता छांट कर सफाई करना - बस सुबह से शाम तक यही काम !
आज फिर मेरा हाथ बढ गया लीची तोड़ने को ! मैं भागा भी था - जैसे पहले भागा करता था - जब स्कूल में था, लेकिन आज पीछे कोई नहीं आया - न पैर थपथपाने की आवाज़ न डंडे का ज़मीन से टकराने का शोर ! कुछ नहीं था पीछे ! और होता भी कैसे ? अम्मा जी जो नहीं थी मारने को ... आज तो लीची भी मीठी नहीं लग रही थी ! वो चुराकर लीची तोडना और भागना - मानो- जैसे कोई नयी जीत की ख़ुशी ! रोज़ नयी जीत और रोज़ नयी ख़ुशी .. कितनी हसीन थी वो ख़ुशी, कितना सुकून था उस चोरी में !

आज न जाने कितने सालों बाद आया हूँ अपने गाँव ! शहर में तो बस एक आध किलो खरीद लेता हूँ - लेकिन आज लीची नहीं, अम्मा जी की गाली सुनने आया हूँ, शहर में कहाँ हैं ऐसी मीठी गालियाँ ? वहां तो बस मिलती हैं तोल के भाव लीचियां !  न दीवार फांदने का झंझट, न लीची के गुच्छे पे पैनी नज़र और न पीछे भागने वाली अम्मा ! चाहे कितने भी लोग क्यूँ न हों शहर में, लेकिन कभी भूलेगी न मुझको वो लीची वाली अम्मा !!