इन पुरानी दीवारों से झांकती ये खिड़कियाँ
कुछ पुराने किस्से सुनाती ये खिड़कियाँ
मस्जिद की अज़ान सुनाती, मंदिर की आरतियां दिखाती
मोहल्ले का शोर तो कभी रात का सन्नाटा सुनाती ये खिड़कियाँ
सुबह की धूप खिलती है यहाँ पर
हवाओं का झोका लाती है यह खिड़कियाँ
रेल की सीटी- गाडी का हॉर्न- साइकिल की घंटी
फेरीवाले की आवाज़ सुनाती है यह खिड़कियां
छोटू की शादी का हुड़दंग हो या होली के रंग
यह खिड़कियाँ ही दिखाती है जब ईद दिवाली में होते हैं सब संग
जब किसी बुज़ुर्ग के मरने का हो रोना
इन्ही खिड़कियों से दिखता है कफ़न का कोना
हंसती भी है रुलाती भी हैं ये खिड़कियाँ
इन पुरानी दीवारों से झांकती ये खिड़कियाँ
