शनिवार, 22 दिसंबर 2012

एक खाली प्याला है ज़िन्दगी



न यार है, न शाम है, न जाम
एक खाली प्याला है ज़िन्दगी

न महफ़िल है, न नज़्म है, न बज्म
सिर्फ तन्हाई है ज़िन्दगी
सोचा बहुत तुझे गले लगा लूँ
लेकिन तू बेवफा है ज़िन्दगी

मैं तो चल पड़ा था अकेला एक राह पर
क्यूँ साया बन गया तू ज़िन्दगी
बरसना चाहूँ मैं भी बदल जैसे
लेकिन तू हवा है ज़िन्दगी

सूरज कि तपिश नहीं, चाँद का महताब दे
मुझको को भी इक ऐसी शब् दे ज़िन्दगी
बज़्म-ए-रोशन ही जहाँ, नज़्म-ए-नियाज़ हो वहां
ऐसी चिराग-ए-महफ़िल दे ज़िन्दगी

फिर वही भरे जाम-उल्फत के पैगाम 
कुछ यूँ छलकता प्याला दे ज़िन्दगी
ज़रा डूब जाऊं, डगमगा लूँ, बहक लूँ फिर से
मौत कि तो फितरत ही है ज़िन्दगी

न यार है, न शाम है, न जाम
एक खाली प्याला है ज़िन्दगी

रविवार, 16 दिसंबर 2012

तू ही मन का मीत




कहानी या कविता लिखूं
या लिखूं तुझपे कोई गीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

कंगना बोले, पायल बोले
बोले सात सुरों का संगीत
तुमको बस मेरी होना है
है मुझे यही अब प्रीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

सावन बाधो बरस गए
मेरे नैना मिलन को तरस गए
आके मिल जा साजन मोरे
यह युग गया है बीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

मैं भी हूँ एक पागल प्रेमी
तुझसे ही मिलने की ठानी
तोड़ के बंधन यह जग के
निभा दूंगा प्रेम की रीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

मोहन की मुरलिया यही सुनाये
राधा की रह भी यही दिखाए
पा के अपने प्रेम को
होगी मेरी जीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

शनिवार, 17 नवंबर 2012

मेरी मय्यत पे ए दोस्त !!

फूल नहीं शराब की बोतल रख देना ....

मोहबत्त की निशानी नहीं, 

तन्हाई का सबब रख देना !!


सोमवार, 5 नवंबर 2012

पठाखो की Union

दिवाली की रात यह क्या गज़ब हो गया, सब पठाखो का अदभुत मिलन हो गया... पठाखो ने भी अपनी एक Union बनायी, और सुतली बोम्ब को प्रेसिडेंट चुन लिया भाई !! पठाके बोले- अब और नहीं फटेंगे, अब और नहीं जलेंगे फट फट के कान फट गए हैं जल जल के प्राण जल गए हैं अबकी बार दिवाली पे मौन व्रत रखेंगे !! रोच्क्केट बोला तुम तो मौन व्रत रख लोगे हम कैसे ज़मीन में फट लेंगे?? अपने को उढ़ने की आदत है, हम बिना बोतल के ही कट लेंगे !! प्रेसिडेंट बोले !! ख़बरदार यह बगावत की बू आ रही है.... पीछे हटो रेलगाड़ी आ रही है !! आजकल इसकी सिटी पिटी गुम है, लोग स्काय शोट चलाते हैं, इसलिए इसकी दूकान बंद है चुपके से फूलझरी ने कहा... क्या सबसे पहले मुझे जलाओगे?? अनार बोला- तुम्हे जला कर ही तो हमरी चोटी में आग लगायेंगे चरखड़ी बोली !! मैं तो घूम घूम के धक् चुकी हूँ, इन सरफिरो से पक चुकी हूँ !! अब तो कोई ऐसा चक्कर चलाओ, और मुझे गोल गोल घुमने से बचाओ !! पास खड़े बबलू ने पठाको की बातें सुन ली, और मन ही मन उन्हें जलाने की तरकीब बुन ली बबलू बोला !! Rocket राजा तुझको तो ऊपर पहुंचाऊंगा, बच न सकेगी फिरकी रानी, तुझको तो गोल गोल घुम्वाऊंगा चोटी पकड़ के मोटे अनार की, फूलझरी से जलाऊंगा... बात ना माने अगर बम्ब तो, ड्बा रख फूड्वाऊंगा !! घबराकर सब पटाके बोले बबलू भैया माफ़ करो, टोफ्फी चोकलेट ले कर, मामले को साफ़ करो !! बबलू बोला मैं न सुनता अब तुम्हारी ये चालाकी, पठाखे सब जलाऊंगा, कुछ न छोडू बाकी !! चाहे हो जाए दिन यहाँ पर, बैग न छोडू खाली.... एक साल बाद फिर आई है यह HAPPY DIWALI

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

बच्चे कि अभिलाषा !!


रंग बिरंगा मेरा बचपन कोमल चंचल मेरा मनं मम्मी की गोद को छोढ़कर दादी के लाड को भूला अब तो सीधा चलने की दिन है माँ !! आज स्कूल में ADMISSION है! शायद वहां सिर्फ खिलौने होंगे बड़े भी वहां पर बौने होंगे कहानियों के देश के जैसे teacher भी वहां परियां होंगी अब घर में ना रहने के दिन है माँ !! शायद यही education है ? लाल गुलाबी मेरी किताबें करती हैं कुछ अजब ही बातें मैंने धरती चौरस देखी यह कहती कि गोल है बसते के भोझ में डूबा मेरा दिन है माँ !! यह क्या confusion है ? teacher बोले चुप कर बैठो आँखें खोलो यूँ ना ऐंठो होमेवोर्क न छोड़े पीछा यह विक्रम का वैताल है क्यूँ हर समय रहना disciplined है माँ !! यह क्या botheration है ? रोते- रोते मैं स्कूल को जाता हँसते- हँसते घर को आता क्या एक दिन ऐसा आएगा जब स्कूल को हँसता जाऊँगा ? नहीं आने वाल ऐसा कोई दिन है माँ !! अब बस यही एक tension है !! एक दिन मैं भी पढ़ जाऊँगा खूब सयाना बन जाऊँगा तब किताबें रख कोने में शायद मैं उड़ पाऊँगा जो भी चाहे वोही करूंगा रात आये या दिन है माँ !! शायद यही destination है !!

अब मैं राह देखता हूँ

थक हार के सुबह से मैं शाम कि राह देखता हूँ धूप से गुज़र कर चांदनी कि राह देखता हूँ पल पल घुटते अरमानो की सपनो की दुनिया देखता हूँ भटके हुए लोगों की इस भीड़ में रहगुज़र से ही पता पूछता हूँ रुकता हूँ पल बहर के लिए फिर चल देता हूँ बिन देखे क्या पा जाऊँगा पहुँच के भी बार बार इस दिल से पूछता हूँ वोह पहुंच गया है, मिल गयी है मंजिल उसको, अब उसे भी लौटा हुआ देखता हूँ क्यूँ जाता हूँ कुछ खबर ही नहीं सबको देखता हुआ, मैं भी चलता हूँ थक हार के सुबह से मैं शाम कि राह देखता हूँ धूप से गुज़र कर चांदनी कि राह देखता हूँ