शनिवार, 22 दिसंबर 2012

एक खाली प्याला है ज़िन्दगी



न यार है, न शाम है, न जाम
एक खाली प्याला है ज़िन्दगी

न महफ़िल है, न नज़्म है, न बज्म
सिर्फ तन्हाई है ज़िन्दगी
सोचा बहुत तुझे गले लगा लूँ
लेकिन तू बेवफा है ज़िन्दगी

मैं तो चल पड़ा था अकेला एक राह पर
क्यूँ साया बन गया तू ज़िन्दगी
बरसना चाहूँ मैं भी बदल जैसे
लेकिन तू हवा है ज़िन्दगी

सूरज कि तपिश नहीं, चाँद का महताब दे
मुझको को भी इक ऐसी शब् दे ज़िन्दगी
बज़्म-ए-रोशन ही जहाँ, नज़्म-ए-नियाज़ हो वहां
ऐसी चिराग-ए-महफ़िल दे ज़िन्दगी

फिर वही भरे जाम-उल्फत के पैगाम 
कुछ यूँ छलकता प्याला दे ज़िन्दगी
ज़रा डूब जाऊं, डगमगा लूँ, बहक लूँ फिर से
मौत कि तो फितरत ही है ज़िन्दगी

न यार है, न शाम है, न जाम
एक खाली प्याला है ज़िन्दगी

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