रविवार, 16 दिसंबर 2012

तू ही मन का मीत




कहानी या कविता लिखूं
या लिखूं तुझपे कोई गीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

कंगना बोले, पायल बोले
बोले सात सुरों का संगीत
तुमको बस मेरी होना है
है मुझे यही अब प्रीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

सावन बाधो बरस गए
मेरे नैना मिलन को तरस गए
आके मिल जा साजन मोरे
यह युग गया है बीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

मैं भी हूँ एक पागल प्रेमी
तुझसे ही मिलने की ठानी
तोड़ के बंधन यह जग के
निभा दूंगा प्रेम की रीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

मोहन की मुरलिया यही सुनाये
राधा की रह भी यही दिखाए
पा के अपने प्रेम को
होगी मेरी जीत
कैसे जग को मैं बताऊं
तू ही मन का मीत

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