रंग बिरंगा मेरा बचपन
कोमल चंचल मेरा मनं
मम्मी की गोद को छोढ़कर
दादी के लाड को भूला
अब तो सीधा चलने की दिन है
माँ !! आज स्कूल में ADMISSION है!
शायद वहां सिर्फ खिलौने होंगे
बड़े भी वहां पर बौने होंगे
कहानियों के देश के जैसे
teacher भी वहां परियां होंगी
अब घर में ना रहने के दिन है
माँ !! शायद यही education है ?
लाल गुलाबी मेरी किताबें
करती हैं कुछ अजब ही बातें
मैंने धरती चौरस देखी
यह कहती कि गोल है
बसते के भोझ में डूबा मेरा दिन है
माँ !! यह क्या confusion है ?
teacher बोले चुप कर बैठो
आँखें खोलो यूँ ना ऐंठो
होमेवोर्क न छोड़े पीछा
यह विक्रम का वैताल है
क्यूँ हर समय रहना disciplined है
माँ !! यह क्या botheration है ?
रोते- रोते मैं स्कूल को जाता
हँसते- हँसते घर को आता
क्या एक दिन ऐसा आएगा
जब स्कूल को हँसता जाऊँगा ?
नहीं आने वाल ऐसा कोई दिन है
माँ !! अब बस यही एक tension है !!
एक दिन मैं भी पढ़ जाऊँगा
खूब सयाना बन जाऊँगा
तब किताबें रख कोने में
शायद मैं उड़ पाऊँगा
जो भी चाहे वोही करूंगा
रात आये या दिन है
माँ !! शायद यही destination है !!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें