थक हार के सुबह से
मैं शाम कि राह देखता हूँ
धूप से गुज़र कर
चांदनी कि राह देखता हूँ
पल पल घुटते अरमानो की
सपनो की दुनिया देखता हूँ
भटके हुए लोगों की इस भीड़ में
रहगुज़र से ही पता पूछता हूँ
रुकता हूँ पल बहर के लिए
फिर चल देता हूँ बिन देखे
क्या पा जाऊँगा पहुँच के भी
बार बार इस दिल से पूछता हूँ
वोह पहुंच गया है, मिल गयी है मंजिल उसको,
अब उसे भी लौटा हुआ देखता हूँ
क्यूँ जाता हूँ कुछ खबर ही नहीं
सबको देखता हुआ, मैं भी चलता हूँ
थक हार के सुबह से
मैं शाम कि राह देखता हूँ
धूप से गुज़र कर
चांदनी कि राह देखता हूँ
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