होश खो गया, नींद उड़ गयी
जब से प्यार का झोका आया है,
मन करे यह लड्डू लपक लूँ
जब से यह मौका आया है !
सूखे तपते जीवन में
यह प्यार तुम्हारा सर्दी है,
कोमल नर्म मुलायम जैसे
नारियल की बर्फी है !
सीधे सरल पथ पर चलते
मन में कुछ दुविधा भी है,
कैसे चलूँ प्रेम डगरिया
लगे मुझे यह जलेबी है !
काली अंधियारी रातों में
यह प्रेम सूर्य किरण लायी है,
सर्वछ न्योछावर कर दूँ तुम पे
यह प्रेम नहीं रसमलाई है !
टप-टप बरसता प्रेम तुम्हारा
मानो बरखा सावन है,
कैसे रुसवा हो जाऊं
लगे यह रसगुल्ले बावन है !
वसंत ऋतु के प्रेम को पाना
जीवन की एक उप्लाभ्दी है,
प्रेम मिठाई के चक्कर में
फस्सी कहाँ यह बुद्धि है !
अब लौट चलो उस सूखे तपते जीवन में
जहाँ हर मौसम एक संघर्ष है,
जीवन की आप थापी सुलझाते हुए ही
संग तुम्हारे उल्हास , संग तुम्हारे ही हर्ष है !!

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