रविवार, 17 फ़रवरी 2013



हमसे ही सुबह होती थी, हमसे ही रौशन जहाँ था !

हर ज़र्रा चमकता था, वो ईद का चाँद कहाँ था ?

अब ढलता सूरज चुप है और शाम का साया दिखता  है,  

बुझी बुझी इन आखों में वो पुराना सपना चुभता है !!

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